अराजक है तुम्हारा प्यार

यह तोड़ देता है सभी बंधन हरेक दीवार

प्रिय देख लो कितना अराजक है तुम्हारा प्यार

शायद सुकोमल गात का भ्रम तोड़ना अच्छा

हर नजरबंदी का उपक्रम तोड़ना अच्छा

खण्डित छवि में स्वप्न अपने जोड़ना अच्छा

इंगितों के रास्तों को छोड़ना अच्छा

कुंद करती जा रही हो रीतियों की धार

प्रिय देख लो कितना अराजक है तुम्हारा प्यार

निर्बन्ध हो तो अनवरत बहती नदी हो तुम

अवरोध पर एक कुलबुलाती त्रासदी हो तुम

टूटते मिथकों से उपजी ताजगी हो तुम

इतिहास से कुछ प्रश्न करती सी सदी हो तुम

भयभीत हैं सब सर्वसत्तावादी पहरेदार

प्रिय देख लो कितना अराजक है तुम्हारा प्यार

पग तुम्हारे कण्टकों पर पड़ रहे तो क्या

थोपे गए प्रतिमान सारे झड़ रहे तो क्या

रस,अलंकारों के चिथड़े उड़ रहे तो क्या

युग की आंखों में ये सपने गड़ रहे तो क्या

एक बेहतर सी तो दुनिया ले रही आकार

प्रिय देख लो कितना अराजक है तुम्हारा प्यार

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प्यार में कैसी मधुर सी

शब्द दर शब्द

मैं जुड़ता रहा

बढ़ता रहा आगे

कभी मुड़ता रहा

प्यार में कैसी मधुर सी

यातना मिलती रही

सूखती बाती दिए की

बस यूंही जलती रही

टूटती बदरी कहीं पर

मौन मुक्ताकाश में

किस जमीं की खोज में

वह रही वनवास में

क्यूं क्षरित हो बूंद बूंद

बर्फ सी गलती रही

प्यार में कैसी मधुर सी

य़ातना मिलती रही

याचना के मौन से जब

स्वप्न मुखरित हो चला 

चेतना का बोध जब

अर्थ सारे खो चला 

बस तुम्हारी गंध ही

सांसो में घुलती रही

प्यार में कैसी मधुर सी

यातना मिलती रही

अहसास का पाथेय मेरा

खो न जाए राह में

देह का अवरोध किंचित

आ न जाए चाह में

जिन्दगी भर देह की यह

वंचना छलती रही

प्यार में कैसी मधुर सी

यातना मिलती रही

चलता रहा चलता रहा

खुद वर्जना गढ़ता रहा

इक कहानी की तरह

तुझे चाहना पढ़ता रहा

जिन्दगी खुदगर्ज थी

चलती रही चलती रही

प्यार में कैसी मधुर सी

यातना मिलती रही

जबसे सच कहने की हिम्मत नही रही

जबसे सच कहने की हिम्मत नही रही
चेहरे पे पहले जैसी रंगत नही रही
फरमानों को आदत हुई जबसे संगीनों की
तामील की मुझमें वही आदत नही रही
चल रही बेरोक हैं जहनों की तालाबंदियां
वास्ते सच के  बगावत नही रही 
दस्ते कातिल  आई है मुहरे हुक्मरां
इंसाफ की कोई भी जरूरत नही रही

जिन्दगी अजीब उलझनों की भीड़ है

अब वास्ते पैबन्द कतरनों की भीड़ है
जिन्दगी अजीब उलझनों की भीड़ है
जब से मेरी पीठ का खन्जर पता चला
कुछ दोस्तों के घर पे दुश्मनों की भीड़ है
जन्नतें बननें लगीं हैं शहर से कुछ दूर
 नुक्कड़ों पे चूंकि निर्धनों की भीड़ है

चलो प्रिये चलें

चलो प्रिये चलें

कांटों भरी इस राह पर

चलें प्रिये

कि जिन्दगी का इम्तहान है

प्यार कोई

आसान सी गली नहीं

फिर भी चलें

कि वक्त का तकाजा है यही

तुम्हारे राह की

बाधा कोई मिथक नहीं

चलो प्रिये

हम इस आईने को तोड़ दें

दिखाता है

तुम्हें जो मात्र एक जिस्म सा

चलो हम

तोड़ दें सौन्दर्य के प्रतिमान सब

तुम्हारी दासता

के वास्ते गढ़ा हुआ
चलो कि

चाहिए मुझको तुम्हारा प्रेम वह

कि जिसमें

हर चुनाव पूर्णतः निर्बन्ध हो

चलो चलें

कि कोई रीति न साक्षी बने

चलो साझा करे

सब कुछ परस्पर इस तरह

जरूरी न रहें

कोई सात फेरे और वचन

चलो हम

 मुक्त कर दें बेड़ियों से रूह को

चलो चलें

कि मंजिलें हैं इन्तजार में

sanjaydixitsamarpit द्वारा

अंधेरा और आजादी

“भीतर तक पसरा हुआ अंधेरा
दूर तक फैला हुआ
ईश्वर की तरह
सर्वव्यापक
ऐसे में मुश्किल होता है
निर्लिप्त होना
चुपचाप देखना
प्रेक्षक की तरह
किसी पहाड़ी से
नीचे की तरफ घाटी में
उतरते हुए भेड़ों को
पुकारा होगा
प्रागैतिहासिक चरवाहे ने
हांका होगा
रेवड़ में उन्हे बन्द करके
दूहा होगा
निर्लिप्त तो वो भी नहीं रहा होगा
सोचा तो होगा
कि कहीं
भेड़ें भी सोचने न लगें
एक अदद आजादी की
आदिम चाहत के निशान
देखे तो होंगे
भेड़ों की सींगों से उकेरे हुए
बाड़े के लट्ठों पर
हर मसीहा है
एक चरवाहा
इंसानों का
सबके भीतर का उजाला लेकर
सबको रखता है अपनी रेवड़ में
फिर भी होती है चूक उससे भी
छूट जाते हैं
एकाध कैद होने से
सबके भीतर का उजाला भी नहीं मरता है
जब तक रेवड़ है
वजूद में अपने
कोई निर्लिप्त नहीं हो सकता
कोई तो भूमिका निभानी है
ईश्वर,चरवाहा,प्रेक्षक या भेंड़
या फिर
टूटी हुई रेवड़
या बहता हुआ लहू
या
उजाले की कोई कौंध
या
……………………….”

चांद जिस रात उतरा था

चांद जिस रात उतरा था आंगन मेरे
टुकड़े टुकड़े हुई टूटकर वर्जना
वंचना से निकलकर
पृथक निर्वसन
सत्य आ ही गया 
एक नवजात सा
हसरतें देह से 
फिर बड़ी हो गईं
जिस्म तेरा लिया 
ओढ़कर सो गया
कौन हूं कौन था 
मेरी पहचान क्या
प्रकृति से मिला 
और पुरुष हो गया
आत्ममय स्वप्न या
स्वप्नमय आत्म था
मोक्ष का ध्येय भी
कितना निर्लिप्त था
प्रकृति ने गढ़ा
मैं वही सोच था
देह बिन कुछ नहीं
देह में सत्य था
चांद जिस रात उतरा था आंगन मेरे
टुकड़े टुकड़े हुई टूटकर वर्जना

किस मोड़ पे मिलना है….

खयालों की रंगी तितलियों ने
न जाने फिर से क्यूं पंख खोले ?
ये जिस्मो जा क्यूं महक चला है ?
आवारा यादों से हौले हौले
कोई कहानी
जो लिखते लिखते
ठहर गई थी,चल रही है
बेचैन शब की
करवटें क्यूं
मिजाज अपना बदल रही है
दबी हुई थी
खाक बनकर
धुंआ उठा क्यूं,तपिश हुई क्यूं ?
तनहाइयां
आशना हो चली थीं
कोई सदा कर रही दिल्लगी क्यूं ?
ये लम्बी रातों की सुब्ह आकर
कैसी खूशबू फिजा मे घोले ?
खयालों की रंगी तितलियों ने
न जाने फिर से क्यूं पंख खोले ?
ये जिस्मो जा क्यूं महक चला है ?
आवारा यादों से हौले हौले

मेढक

हंस पड़े थे सारे मेढक
अपने हमप्रजाति नवागंतुक पर
आसमान से उतरा देवदूत जानकर
शुरू मे बड़ी आवभगत की
उस कूप जगत मे हलचल सी मच गई थी
उन्हें क्या पता था कि
उसके स्वप्रदत्त कैलकुलेशन मे
आई त्रुटि के कारण छलांग गड़बड़ा गई थी
अनायास ही एक गलती ने उसको
क्षणिक देवत्व बख्स दिया था
और जब
जल ,जमीन और आसमान सम्बन्धी
उनकी धारणा को
नवागंतुक ने खारिज किया
तो उसका देवत्व क्षीण हो गया
एकबारगी सब हंस पड़े उस पर
फिर शैतान का भेजा हुआ जानकर
बहिष्कार कर डाला
आज भी वो बहिष्कृत
मुक्ति के लिए
किसी प्यासे की बाल्टी की
प्रतीक्षा मे है

ये कविता नही है —

रात का दूसरा प्रहर
अशांत क्षेत्र घोषित इलाके का थाना
एक पुलिस अफसर
टार्चर रूम मे बन्दी औरत
पूछताछ,गालियां,लहूलुहान जिस्म
“मुझे मार क्यूं नही देते ? ”
“एनकाउन्टर तो जानेमन
कर ही डालते तुम्हारा,मगर
मजबूर हैं,कोर्ट से कस्टडी मे जो मिली हो
खैर तुम्हें जिन्दा लाश तो बना ही देंगे
खुद पर थूकोगी शर्म से ”
चीरहरण
“कहां हो कृष्ण बचा लो मुझे ”
कृष्ण को सुनाई नही दिया
अन्ततः
निर्वसन
लहुलुहान यौनांग की दहलीज पर
लोकतन्त्र,गणतन्त्र,मौलिक अधिकार
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विश्व गुरू भारत
नंगा हो नर्तन
मान मर्दन मान मर्दन
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