ये आंखे

ये कितने अर्थ
स्रजित करती हैं
मन में
होकर प्रश्नसूचक
जब देखती हैं
ये आखें

वही पल खोजती सी

परम अंतरंगता के

कभी कहती कहानी

कोई भूली हुई सी

मै कितने अर्थ खोलूं ?

बहुत कुछ चाहती हैं

सदा बनकर पहेली

ये आंखे

कभी आईना बनकर

मेरा अन्तस दिखाती

कभी पतवार बनकर

पार मुझको लगातीं

कभी बनकर सखा सी

कभी बनकर सहेली

ये आखें

कभी ये प्रेम से

सने मिल जुल क्षणों में

कभी ये गुदगुदे

मधुर आमन्त्रणों मे

खींच मुझको ले जातीं

कभी बन डोर सी

कभी बनकर हथेली

ये आंखे

sanjaydixitsamarpit द्वारा

मौन मन

आहट कैसी ?
कौन है ?
यहां कौन है ?
हवा से खुल गए
हैं पट शायद.
कहीं कोई नहीं
मन मौन है.
इस मौन के
नीचे दबी हैं
परतें विगत की
कोई तो सूत्र हो
कहूं कैसे
स्व -गत की ?
मेरे भीतर ही
लावा
पिघलकर
बह रहा है
मेरे भीतर का लावा
उबलकर
कह रहा है
“तोड दो बेडियां –
मेरा
विस्तार दे दो
निकालो
मौन से
मुझे
उद्गार दे दो”

आओ जनगण का त्यौहार मनाएं

आओ जनगण का त्यौहार मनाएं
भूख से व्याकुल
पढने को आतुर
अपने ही हक़ से
वंचित दिलों में
संहर्षों की एक ज्वाला जलाएं
आओ जनगण का त्यौहार मनाएं
जिनके हाथों में वंचित
समाजों की दुनिया
चलो छीन लें उनके
हाथों से दुनिया
आओ पुनः मुक्ति के गीत गाएं
आओ जनगण का त्यौहार मनाएं
जहां हम सभी के
सब हों हमारे
जहां हो सभी कुछ
इक साझे के घर सा
चलो ऎसी दुनिया के सपने सजाएं
आओ जनगण का त्यौहार मनाएं

sanjaydixitsamarpit द्वारा

शब -ए-गम की कैद में वो रोशनी अच्छी लगी

हमको दिले आवारा की आवारगी अच्छी लगी
तेरे आरजू में कट रही ये जिन्दगी अच्छी लगी
दिल में निजाते हिज्र की ख्वाहिश जगा के एक दिन
चल दिए फिर छोडकर ये दिल्लगी अच्छी लगी
दूर से आती हुई उम्मीद की वायस बनी
शब -ए-गम की कैद में वो रोशनी अच्छी लगी

sanjaydixitsamarpit द्वारा

वक्त की धारा में

दो किनारे नदी के
मिल कभी पाते नहीं
मिलना क्या
पहचान ही खो जाती है
पानी की ये दीवार
जब सूख जाती है
सदियों से ये
पुल भर की दूरी
बन गई
सदियों की दूरी
पदधूलियां
उनके वजूद को
इस तरह मिलाती हैं
अकिंचन प्रेम की
अनुभूतियां
वक्त की धारा में
बहती जाती हैं.

sanjaydixitsamarpit द्वारा

आकाश का स्रजन करें……..

बन गईं जो दूरियां
मिटाने का यतन करें
चलें प्रिये उडान पर
आकाश का स्रजन करें.
वो क्षण परम अनुभूति का
सहसा हमारे बीच था
सम्बन्धों को नव अर्थ दे
उन्हे रोपता,उन्हे सींचता.
वो पल है खो गया कहीं
वक्त के प्रवाह में,
इक दिन अचानक पाया कि
हम हैं अकेले राह मे.
वो जो साथ हैं वो हम नही
मेरी तुम्हारी देह है
न जाने घर कब बन गया
जरूरतों का गेह है.
वो पल बहुत अमूल्य है
चलो फिर से उस पल को जिएं
इक पल को फिर जिन्दा करें
बस एक दूजे के लिए.
वक्त मे ठहर चुके उस
चित्र मे जीवन भरें.
चलें प्रिये उडान पर
आकाश का स्रजन करें.

sanjaydixitsamarpit द्वारा

वेदना बहुत अकुलाई है .

सब अशेष सा,सब ओझल
धुंध सी कैसी छाई है ?
कोई मरीचिका राही की
सुध बुध हर लेने आई है .
जिस ह्रदय को रीतेपन मे ही
इक सदी हो जैसे बीत गई
उस एकाकी अन्तस मे क्यूं
कोई आहट पडी सुनाई है .
संकेत कोई है विरही को
कि विरह-व्यथा अब और नही
आकुल प्रभात की इच्छा मे
यह रात बहुत अलसाई है .
दीपक ज्वाला जलते जलते
बुझने से पहले तीव्र हुइ.
मधुर मिलन से पल पहले
वेदना बहुत अकुलाई है .

sanjaydixitsamarpit द्वारा

छवि कौन छीनेगा मुझसे …….

नहीं मुझे यह आत्मवंचना-मेरी सदा ही रहो प्रिये
निशा-चांदनी अन्तरतम की वास ह्रदय में करो प्रिये
मुझे कहीं बंदी न कर लें आरोपित आदर्श प्रिये
जीवन है माटी तो तुम हो पारस का स्पर्श प्रिये
राह प्रेम की रोक सकी है कहीं कोई वर्जना प्रिये
छवि कौन छीनेगा मुझसे मन मे जो ली बना प्रिये.

sanjaydixitsamarpit द्वारा

मनवा तो मीत है

मन के हारे से हार
मन के जीते से जीत है
मनवा की सुन लो जी
मनवा तो मीत है
उम्मीदों की नगरी है
सपनों का गाँव है
पूस में धुप है तो
जेठ में छाँव है
कर्कश कोलाहल में
सुमधुर संगीत है
मनवा की सुन लो जी
मनवा तो मीत है
लोग आते हैं जाते हैं
दुनिया का मेला है
सारी यादें सहेजे
ये मितवा अकेला है
जहाँ सबमे अमोल
किसी प्रियतम की प्रीत है
मनवा की सुन लो जी
मनवा तो मीत है
कम नहीं पड़ना
बढ़ते ही जाना है
बांटे से बढ़ जाए
अक्षत खजाना है
खोलो तो द्वार
न खोलो तो भीत है
मनवा की सुन लो जी
मनवा तो मीत है

sanjaydixitsamarpit द्वारा