वेदना बहुत अकुलाई है .

सब अशेष सा,सब ओझल
धुंध सी कैसी छाई है ?
कोई मरीचिका राही की
सुध बुध हर लेने आई है .
जिस ह्रदय को रीतेपन मे ही
इक सदी हो जैसे बीत गई
उस एकाकी अन्तस मे क्यूं
कोई आहट पडी सुनाई है .
संकेत कोई है विरही को
कि विरह-व्यथा अब और नही
आकुल प्रभात की इच्छा मे
यह रात बहुत अलसाई है .
दीपक ज्वाला जलते जलते
बुझने से पहले तीव्र हुइ.
मधुर मिलन से पल पहले
वेदना बहुत अकुलाई है .

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sanjaydixitsamarpit द्वारा

2 टिप्पणियाँ “वेदना बहुत अकुलाई है .” पर

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