चुपके से

और कुछ देर है बस
आएगी शाम चुपके से
खत्म हो लेंगे सभी
दिन के काम चुपके से
शेष रह जाएगा तनहाई
के नाम चुपके से
तब चंद बातें भी
ऎ दिल मुझसे कर लेना
कुछ धड़्कते दिए
दर्द के जल जाएंगे
और परछाईयां
यादों की यहां घूमेंगी
अक्स की,नक्श की
टूटे हुए जज्बातों की
ये जो आए हैं
भरने को मेरा खालीपन
पल मे जाएंगे चले
छोड़्के तनहा ऎ दिल
और कुछ देर को
रुक जाएं भी तो
क्या देंगे ये,फिर
कोई भरता हुआ जख्म
उभर आएगा
आओ मिल जुल के
इस रात का रस्ता खोजें
देखो जलता है दिया
दूर कहीं,वो देखो
कोई बस्ती है वहां
ख्वाबों की,अरमानों की
किसी अनजान,राह तकती
आखों के लिए
चलो वहीं पे चलें
मोड़ के ये राहे सफर
जी चुके उम्र तमाम
चुपके से

हे कवि

पत्थर से
संवाद किया किसने ?
था कौन अकिंचन ?
कवि था वह.
वह भरता था
कई अर्थबोध
पाषाणों मे,
देता था जीवन.
हे कवि
करूं मै तुम्हे नमन

sanjaydixitsamarpit द्वारा

मै कहता हूं कह जाने दो

स्मृ्तियों के उपवन से
आए जो पवन के झोंके सा
फूलो की चादर लेकर
तो आने दो
विगत के चित्रित पृ्ष्ठों में
व्यथा का कोई बिन्दू भी
होना चाहे फिर से तत्पर
हो जाने दो
ज्यों एक अजनबी मिलता है
वैसे भी वो मिलना चाहे तो
तो क्या है ?परस्पर होंगे तो
मिल जाने दो
जब भी तुमसे मिलना होगा
उस क्षणिक मिलन के बाद प्रिये
अहसास जो तुमको खोने का
दब गया मनःभूमि मे कहीं
अंकुर की तरह वह फूटेगा
फिर से वह हरा भरा होगा
तो इसी उदासी के बल पर
मै वृ्हत समय मे जी लूंगा
जो मिले कभी थे बस यूं ही
वो बूंद सुखों की पी लूंगा
फिर क्या हो जब कुछ कहें सुने
जब क्षणिक मिलन को हम बैठें
कहीं यूं न हो अनकहे भाव
कोई झीना पर्दा कर बैठें
पर मिलन अपेक्षित है प्रियवर
कोई बात न हो,कोई बात नहीं
तुम न भी सुनो कोई बात नही
मै कहता हूं
कह जाने दो

संवाद

1—-
मन की वीणा तुम्हारे हाथों में
जिस पर खिंच गई सी
तार हूं मै
बस यूं ही फेरो
उंगलियां मुझ पर
कांप जाऊं मै
झनझना जाऊं
एक महका सा
राग बन जाऊं
2——
तेरे सांचे मे ढला
मोम हूं मै
मै ही वह
चेतना की बाती भी
मुझे स्पर्श दो
स्फुर कर दो
जल उठूं लौ की तरह
और थरथरा जाऊं
एक सूरज न बनूं मै
न सही
एक अंधेरे की
आस बन जाऊं
3———
तेरी सृ्ष्टि का
मै समन्दर हूं
मन मे लहरें
असंख्य उठती हैं
प्रेम का ताप दो
मै भाप बनू उड़ जाऊं
अपनी हरियाली से
शीतल कर दो
संघनित हो चलूं
बरस जाऊं

दर्द चेहरा भी बयां करता है

कागज का
सहमा हुआ ये कोरापन
कह रहा है
इबारतें लिखी थीं यहां
मिटा चुकी है
वक्त की नमी जिनको
मगर उभरे हुए
वो दाग कहां जाएंगे
क्यूं करीने से
नही ओड़्ते बिछाते हो
हजार करवटों मे
रात गुजर जाती है
क्यूं नही
सिलवटें मिटाते हो
चादरो की भी
जुबां समझो तो
रंग चेहरे पे
आते जाते है
क्या कहते हो
क्या छिपाते हो
पढ़ने वाले तो
पढ़ ही लेते है
बात आई गई
हो जाए भले
दर्द चेहरा
भी बयां करता है
—————-बस ऎसे ही हल्के फुल्के मूड मे एक फास्ट फूड

निशा वेदना मे ही बीती

निशा वेदना मे ही बीती
तुम पर जग जीवन हारे
अमराई भी सूनी सूनी
रिक्त वीथियां बिना तुम्हारे
नियती कितना कम देती है
दो पल ही तो साथ गुजारे
उलझ गया जब जगत रीत मे
याद रखा सब तुम्हे बिसारे
स्व्प्न मे कोई मुस्काया है
ह्रदय तुम्हारा नाम पुकारे