चलो प्रिये चलें

चलो प्रिये चलें

कांटों भरी इस राह पर

चलें प्रिये

कि जिन्दगी का इम्तहान है

प्यार कोई

आसान सी गली नहीं

फिर भी चलें

कि वक्त का तकाजा है यही

तुम्हारे राह की

बाधा कोई मिथक नहीं

चलो प्रिये

हम इस आईने को तोड़ दें

दिखाता है

तुम्हें जो मात्र एक जिस्म सा

चलो हम

तोड़ दें सौन्दर्य के प्रतिमान सब

तुम्हारी दासता

के वास्ते गढ़ा हुआ
चलो कि

चाहिए मुझको तुम्हारा प्रेम वह

कि जिसमें

हर चुनाव पूर्णतः निर्बन्ध हो

चलो चलें

कि कोई रीति न साक्षी बने

चलो साझा करे

सब कुछ परस्पर इस तरह

जरूरी न रहें

कोई सात फेरे और वचन

चलो हम

 मुक्त कर दें बेड़ियों से रूह को

चलो चलें

कि मंजिलें हैं इन्तजार में

sanjaydixitsamarpit द्वारा

अंधेरा और आजादी

“भीतर तक पसरा हुआ अंधेरा
दूर तक फैला हुआ
ईश्वर की तरह
सर्वव्यापक
ऐसे में मुश्किल होता है
निर्लिप्त होना
चुपचाप देखना
प्रेक्षक की तरह
किसी पहाड़ी से
नीचे की तरफ घाटी में
उतरते हुए भेड़ों को
पुकारा होगा
प्रागैतिहासिक चरवाहे ने
हांका होगा
रेवड़ में उन्हे बन्द करके
दूहा होगा
निर्लिप्त तो वो भी नहीं रहा होगा
सोचा तो होगा
कि कहीं
भेड़ें भी सोचने न लगें
एक अदद आजादी की
आदिम चाहत के निशान
देखे तो होंगे
भेड़ों की सींगों से उकेरे हुए
बाड़े के लट्ठों पर
हर मसीहा है
एक चरवाहा
इंसानों का
सबके भीतर का उजाला लेकर
सबको रखता है अपनी रेवड़ में
फिर भी होती है चूक उससे भी
छूट जाते हैं
एकाध कैद होने से
सबके भीतर का उजाला भी नहीं मरता है
जब तक रेवड़ है
वजूद में अपने
कोई निर्लिप्त नहीं हो सकता
कोई तो भूमिका निभानी है
ईश्वर,चरवाहा,प्रेक्षक या भेंड़
या फिर
टूटी हुई रेवड़
या बहता हुआ लहू
या
उजाले की कोई कौंध
या
……………………….”

चांद जिस रात उतरा था

चांद जिस रात उतरा था आंगन मेरे
टुकड़े टुकड़े हुई टूटकर वर्जना
वंचना से निकलकर
पृथक निर्वसन
सत्य आ ही गया 
एक नवजात सा
हसरतें देह से 
फिर बड़ी हो गईं
जिस्म तेरा लिया 
ओढ़कर सो गया
कौन हूं कौन था 
मेरी पहचान क्या
प्रकृति से मिला 
और पुरुष हो गया
आत्ममय स्वप्न या
स्वप्नमय आत्म था
मोक्ष का ध्येय भी
कितना निर्लिप्त था
प्रकृति ने गढ़ा
मैं वही सोच था
देह बिन कुछ नहीं
देह में सत्य था
चांद जिस रात उतरा था आंगन मेरे
टुकड़े टुकड़े हुई टूटकर वर्जना