जिन्दगी अजीब उलझनों की भीड़ है

अब वास्ते पैबन्द कतरनों की भीड़ है
जिन्दगी अजीब उलझनों की भीड़ है
जब से मेरी पीठ का खन्जर पता चला
कुछ दोस्तों के घर पे दुश्मनों की भीड़ है
जन्नतें बननें लगीं हैं शहर से कुछ दूर
 नुक्कड़ों पे चूंकि निर्धनों की भीड़ है

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