जबसे सच कहने की हिम्मत नही रही

जबसे सच कहने की हिम्मत नही रही
चेहरे पे पहले जैसी रंगत नही रही
फरमानों को आदत हुई जबसे संगीनों की
तामील की मुझमें वही आदत नही रही
चल रही बेरोक हैं जहनों की तालाबंदियां
वास्ते सच के  बगावत नही रही 
दस्ते कातिल  आई है मुहरे हुक्मरां
इंसाफ की कोई भी जरूरत नही रही