चांद जिस रात उतरा था

चांद जिस रात उतरा था आंगन मेरे
टुकड़े टुकड़े हुई टूटकर वर्जना
वंचना से निकलकर
पृथक निर्वसन
सत्य आ ही गया 
एक नवजात सा
हसरतें देह से 
फिर बड़ी हो गईं
जिस्म तेरा लिया 
ओढ़कर सो गया
कौन हूं कौन था 
मेरी पहचान क्या
प्रकृति से मिला 
और पुरुष हो गया
आत्ममय स्वप्न या
स्वप्नमय आत्म था
मोक्ष का ध्येय भी
कितना निर्लिप्त था
प्रकृति ने गढ़ा
मैं वही सोच था
देह बिन कुछ नहीं
देह में सत्य था
चांद जिस रात उतरा था आंगन मेरे
टुकड़े टुकड़े हुई टूटकर वर्जना

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