अंधेरा और आजादी

“भीतर तक पसरा हुआ अंधेरा
दूर तक फैला हुआ
ईश्वर की तरह
सर्वव्यापक
ऐसे में मुश्किल होता है
निर्लिप्त होना
चुपचाप देखना
प्रेक्षक की तरह
किसी पहाड़ी से
नीचे की तरफ घाटी में
उतरते हुए भेड़ों को
पुकारा होगा
प्रागैतिहासिक चरवाहे ने
हांका होगा
रेवड़ में उन्हे बन्द करके
दूहा होगा
निर्लिप्त तो वो भी नहीं रहा होगा
सोचा तो होगा
कि कहीं
भेड़ें भी सोचने न लगें
एक अदद आजादी की
आदिम चाहत के निशान
देखे तो होंगे
भेड़ों की सींगों से उकेरे हुए
बाड़े के लट्ठों पर
हर मसीहा है
एक चरवाहा
इंसानों का
सबके भीतर का उजाला लेकर
सबको रखता है अपनी रेवड़ में
फिर भी होती है चूक उससे भी
छूट जाते हैं
एकाध कैद होने से
सबके भीतर का उजाला भी नहीं मरता है
जब तक रेवड़ है
वजूद में अपने
कोई निर्लिप्त नहीं हो सकता
कोई तो भूमिका निभानी है
ईश्वर,चरवाहा,प्रेक्षक या भेंड़
या फिर
टूटी हुई रेवड़
या बहता हुआ लहू
या
उजाले की कोई कौंध
या
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