मेढक

हंस पड़े थे सारे मेढक
अपने हमप्रजाति नवागंतुक पर
आसमान से उतरा देवदूत जानकर
शुरू मे बड़ी आवभगत की
उस कूप जगत मे हलचल सी मच गई थी
उन्हें क्या पता था कि
उसके स्वप्रदत्त कैलकुलेशन मे
आई त्रुटि के कारण छलांग गड़बड़ा गई थी
अनायास ही एक गलती ने उसको
क्षणिक देवत्व बख्स दिया था
और जब
जल ,जमीन और आसमान सम्बन्धी
उनकी धारणा को
नवागंतुक ने खारिज किया
तो उसका देवत्व क्षीण हो गया
एकबारगी सब हंस पड़े उस पर
फिर शैतान का भेजा हुआ जानकर
बहिष्कार कर डाला
आज भी वो बहिष्कृत
मुक्ति के लिए
किसी प्यासे की बाल्टी की
प्रतीक्षा मे है

ये कविता नही है —

रात का दूसरा प्रहर
अशांत क्षेत्र घोषित इलाके का थाना
एक पुलिस अफसर
टार्चर रूम मे बन्दी औरत
पूछताछ,गालियां,लहूलुहान जिस्म
“मुझे मार क्यूं नही देते ? ”
“एनकाउन्टर तो जानेमन
कर ही डालते तुम्हारा,मगर
मजबूर हैं,कोर्ट से कस्टडी मे जो मिली हो
खैर तुम्हें जिन्दा लाश तो बना ही देंगे
खुद पर थूकोगी शर्म से ”
चीरहरण
“कहां हो कृष्ण बचा लो मुझे ”
कृष्ण को सुनाई नही दिया
अन्ततः
निर्वसन
लहुलुहान यौनांग की दहलीज पर
लोकतन्त्र,गणतन्त्र,मौलिक अधिकार
सनातन संस्कृति,विरासत
विश्व गुरू भारत
नंगा हो नर्तन
मान मर्दन मान मर्दन
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सुबह का अखबार
रिलायन्स का बारह हजार
करोड़ का कारोबार
विद्या बालन के
ठुमको की बहार
प्रधान मन्त्री की यात्रा
विदेश व्यापार
अग्नि मिशाइल
पाकिस्तान लाचार
मर्दाना ताकत
विग्यापन बेशुमार
सुबह का अखबार
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रात वाली खबर
सम्पादक का कमरा
डस्टबिन की शोभा
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता
रिपोर्टर को फटकार
व्यवसायिक उपचार

मैं एक ख्वाहिश भी छोड़ आया

हजारों सपनो की कोठरी में
मैं एक ख्वाहिश भी छोड़ आया
क्यूं चौंक उठती हैं नीन्दें मेरी
खिड़कियां मै खुली छोड़ आया
ये दिल के साहिल के रेत पर यूं
निशान अब भी पड़े हुए हैं
तेरे निशां दूर तक जा रहे है
मेरे निशां बस खड़े हुए हैं
तुम्हारी हस्ती मे करके सजदा
मै अपनी राहो को मोड़ आया
दर्दे दिल तो निभा रहा है
मै एक रिश्ता जो तोड़ आया
हजारों सपनो की कोठरी में
मैं एक ख्वाहिश भी छोड़ आया
क्यूं चौंक उठती हैं नीन्दें मेरी
खिड़कियां मै खुली छोड़ आया

जब समय पैदा हुआ था

तुम चार आयामों के
किसी निर्देशांक पर
साजिशन फसा दिए गए हो
और सुना है कि तुम्हारी नस्ल का श्रेष्ठता बोध
और उसका शास्त्रीय प्रमाण
किसी मिथक की पैदाइश है
क्योंकि तुम्हारी इस आत्ममुग्धता का तल
किसी घटना शंकु के शीर्ष का विस्तार नही है
शीर्ष पर जड़ तत्व है
जो खुद एक घटना है, जब
समय पैदा हुआ था
जब ‘पूर्व’ व ‘पश्चात’ को आधार मिला था
ज्ञान का सारा उपक्रम देश काल की सीमा का
अतिक्रमण नहीं कर सकता
यही सच है बाकी सब लफ्फाजी है
निर्माता वस्तुओ का होता है
और श्रृष्टि कोई वस्तु नही
वस्तुओ और घटनाओ का समुच्च्य है
सत्य तुम पर हसता है
जब तुम्हारी खोखली तर्क बुद्धि पूछती है
“हे ईश्वर कब रचा तूने काल को ?”
जबकि समय कहता है
“सारे सवाल ही मेरी पैदाईश का नतीजा हैं ,
खुद ईश्वर के अस्तित्व का सवाल भी ”
और अन्त मे सुनो मेरे प्रत्ययवादी मित्र
तुम्हारी समझ की समस्त ज्यामिति को
किसी ब्लैक होल के घटना क्षितिज पर जाने से
कोई नही बचा पाएगा
और तुम्हारा मोक्ष –
कभी न खत्म होने वाली
त्रासदी बन जाएगा

क्यो ह्रदय की वेदना को स्वर न दूं मै

क्यों ह्रदय की वेदना को
स्वर न दूं मै
तुम टूटते सपनो की
हर एक कब्र पर
एक शातिराना जश्न के
दीपक जलाना
हर लाश का स्वामित्व लेना
और मुर्दा बस्तियों में
गुनगुनाना
जिन्दगी की पौध
को हर अब्र पर
क्यूँ नहीं तत्पर करूँ मै
क्यों ह्रदय की वेदना को
स्वर न दूं मै
जिन्दगी भी मांगती है
मूल्य जो
है चुकाता कौन अपने
रक्त से
तुम जो परजीवी
लहू को चूसते
हार जाओगे हमारे
वक्त से
आजमाइश आख़री है
सब्र पर
प्रतिरोध के इस कारवां में
चल पडू मै
क्यों ह्रदय की वेदना को
स्वर न दूं मै
तुम करो विध्वंश ,मै
विप्लव करूंगा
आह भी होगी, ह्रदय में
आग भी मै ही
भरूंगा
तुम ह्रदय के चांद की
कतरन सजाना
मैने तो चाहा उसे
दिल मे बसाना
मै समय की लेखनी
का हमसफर
क्यों न कण्टकयुक्त
मुक्तिपथ वरूं मै
क्यो ह्रदय की वेदना को
स्वर न दूं मै

उम्मीदों ने आ आके कहा

संचित स्मृतियों में वे दिन
शोभा तेरे उस चितवन की
एक झलक को खिलता अंतर्मन
रुक जाती सी दिल की धड़कन
उम्मीदों ने आ आके कहा
बेकल सी घड़ियाँ बीत चलीं
जागी हुई रात की आँखों में
जब आहट की लौ चमक उठी
आँखों के क्षितिज पर अब होगी
सूर्योदय की सुन्दर लाली
मन उपवन पर बिखरेगी
जब धूप सुनहरी मतवाली
उम्मीद यही थी ऐ प्रियवर
फिर शाम विरह की ना होगी
पर ऐसा कब होना था
तेरे आँचल की छत नहीं मिली
वह धूप विरह – दोपहरी की
पीड़ा में नमी भी सोख चली
पथराई आँखों ने देखा
आकाश हुआ था बिन बदरी
हर सुबह उठा चल देता था
मै तीव्र उम्मीदों की गठरी
उम्मीदों ने आ आके कहा
बेकल सी घड़ियाँ बीत चलीं
जागी हुई रात की आँखों में
जब आहट की लौ चमक उठी
ठंडी सी चांदनी रातों में
मै टूटा ह्रदय लिए फिरता
चंदा से गलबहियां करता
कुछ मलय मै बाहों में भरता
मै पथिक एकाकी यादों का
इक हूक सदा उठती रहती
चलते चलते इक दिन यूं ही
फिर देखे कुछ टूटे से दिल
जीवन की भटकती साँसों में
जीते रहते थे जो तिल तिल
एकाकीपन ने विलय किया
सूखी धरती बंजर धरती
वे प्रेम पथिक हरगिज न थे
पर मेरी तरह ठुकराए हुए
इंसानों के जिन्दा मरघट में
थे स्वप्न के शव दफनाए हुए
ये निर्धन रेगिस्तानो की
थी टेढ़ी मेढ़ी पगडंडी
उम्मीदों ने आ आके कहा
बेकल सी घड़ियाँ बीत चलीं
जागी हुई रात की आँखों में
जब आहट की लौ चमक उठी
मेरी पीड़ा अहसासों की
थी वास्तु सत्य उनकी पीड़ा
वे मात्र जलालत के ताने
चीथड़े बदन वे बेपर्दा
जब भूख निवाला बन जाए
फिर पीठ पेट की क्या दूरी
तोड़े होंगे मैंने भी दिल
कोई पेट नहीं मैंने तोड़ा
था बोझ बहुत ही अंतस पर
पर दाग नहीं मैंने छोड़ा
इस राह जो हम तुम मिल बैठे
चलो भींच ले सब अपनी मुट्ठी
उम्मीदों ने आ आके कहा
बेकल सी घड़ियाँ बीत चलीं
जागी हुई रात की आँखों में
जब आहट की लौ चमक उठी

गुरुमंत्र

सुना है
गुरू अपने शिष्यों के
कानों मे फूकते हैं
गुरूमंत्र
जो
मुक्तिपथ पर
मोक्ष पथ पर
तत्व ज्ञान की ओर
होता है
पहला कदम

मेरे भी गुरू ने
किन्ही आत्मिक अनुभूति के
पावन क्षणों मे
दिया था मुझे
गुरूमंत्र
कुछ ऎसे
“मेरे बेटे !
मोक्ष अध्यात्म मात्र नहीं
सांसारिक नैतिकता है
अध्यात्म प्रत्यय मात्र नही
नैतिक भौतिकता है
तो सुनो !
होना संशय रहित
है शर्त इसकी
और इसके लिए
है जरूरी संशय करना
आंखों देखी
कानो सुनी
कागज – लिखी
कैसे भी अभिव्यक्त हो
कोई बात
सहसा मत करना विश्वास
एक -शंका करना
दो -उसका समाधान करना
तीन-फिर जो मिले विश्वास करना
सुझाता हूं मार्ग भी
समाधान का
जीवन तुम्हारा जिस तरह
सत्य है तुम्हारे लिए
अकाट्य सा
उसी तरह मृ्त्यु भी
अकाट्य सत्य
जीवन का है
जैसे जैसे जीते गए तुम
सीखते गए वैसे ही तुम
जीवन का पाठ
जाने अनजाने परखते रहे
व्यवहार की कसौटी पर
हर आगत को तुम

तो मेरे बेटे
जीते जी
तुम साथ रखना ये कसौटी
और याद रखना सूत्र तीन
फिर किसी भी क्षेत्र मे
जीवन मे
कला मे
विज्ञान मे
पा सकोगे
सत्य को तुम खोजकर
विश्वास करना
जब तक जियो
और मृ्त्योपरांत
क्या पता क्या होता है ?
कौन बताने आया है ?
जाने के बाद ! “

वो खोजी अब कलन्दर हो गया है

ये दिल तो इक मकां था
हुआ जब प्यार तो घर हो गया है
जिसे मंजिल पता थी
उसे रस्ता मयस्सर हो गया है
थी हसरत आसमां की
इरादा खुद ही सह पर हो गया है
क्षुद्र तो राह मे था
बूंद तो अब समन्दर हो गया है
निगाहें थीं खला मे
वो खोजी अब कलन्दर हो गया है

“फ़ैज़” की याद मे / “शीशों का मसीहा “

किस आशा मे इन टुकड़ों को

चुनते हो और सजाते हो

यहां कोई नही आने वाला

किससे उम्मीद लगाते हो ?

ये सपने कांच के घर जैसे

जब भूख गरीबी के पत्थर

छूटेंगे बरस ही जाएंगे

सौ सौ टुकड़ो मे सपनों के

सौ सौ टुकड़े बस जाएंगे

जो टूट गया और बिखर गया

वह दर्पण हो या ह्रदय प्रिये

उन खण्डित अवशेषों मे

कुछ सपने फिर भी बचे रहे

शोकगीत क्यूं गाते हो 

बिखरे तो बिखरते रहने दो

ये अश्रु सूख ही जाएंगे

तिरते हैं तिरते रहने दो

ये सच है टूटा करते हैं

पर खत्म नही हो जाते है

एक घर को खाली करते हैं

तो बस्ती एक बसाते हैं

रोपो इन टूटे टुकड़ों को

क्यूं पत्थर से घबराते हो

किस आशा मे इन टुकड़ों को

चुनते हो और सजाते हो

यहां कोई नही आने वाला

किससे उम्मीद लगाते हो ?

 

सान्त्वना ही दे सकूंगा

वेदना तो कम न होगी

सान्त्वना ही दे सकूंगा

जो कर सकूं विश्वास प्रियवर

यह ह्रदय तेरा सुलगता

और नयन -अवसाद तेरा

उड़ चलेगा भाप बनकर

मेरे शब्दों की तपन से

प्रेम के अर्पित सुमन से

तेरे मनस की अंध -वीथी

मे अगर आवाज मेरी

जल पड़े एक दीप बनकर

माथे पर खिंच आई रेखा

की किसी अप्रिय सुधी को

ख्त्म कर दे जो प्रिये तो

अवसानमय यौवन तुम्हारा

जी उठे फिर से  यदि तो

फिर वही मै गीत गाऊं

निर्झरों वन प्रान्तरों के

पर्वतों के चांदनी के

प्रेम के और प्रेयसी के

तप्त हाथों की छुअन से

कांपती उस रूपसी के

पल पल बदलते भावों की

उस चेहरे पर सरकसी के

अधरों पर कभी अनायास ही

रुक गई उस लालिमा के

फूल बरसाने को आतुर

शाख की उस भंगिमा के

एक सुगन्धित सा निमन्त्रण

दे रही तत्पर निशा के

फिर कहो प्रियवर तुम्ही

मै अनवरत गाता रहूंगा

शब्दों की माला बनाकर

रोज पहनाता रहूंगा

पर नही जीवन समर मे

कुछ भी कम होगा प्रिये

जख्म पर नश्तर चलेगा

दर्द तो होगा प्रिये

शब्द मरहम मात्र हैं

साधन हैं पैनापन लिये

इस पर नही है वश मेरा

कितना भी चाहूं जो प्रिये

निर्दयी साधन को सहने

का यतन कर लो प्रिये

वेदना तो कम न होगी

सान्त्वना ही दे सकूंगा